Demonetization in Hindi – डीमोनेटाइजेशन मतलब विमुद्रीकरण

By | December 5, 2016

Demonetization को हिंदी में विमुद्रीकरण कहते हैं|

क्या हैं विमुद्रीकरण (Demonetization)?

विमुद्रीकरण का सही तात्पर्य यह हैं कि जब किसी देश कि सरकार अपनी पुरानी मुद्रा को कानूनी रूप से बंद कर देती हैं तो इस प्रक्रिया को विमुद्रीकरण (Demonetization) कहते हैं। विमुद्रीकरण (Demonetization) होने के बाद उस मुद्रा की कोई कीमत नही रह जाती हैं । ये मुद्रा बनाड़ हो जाने के बाद आप कोई खरीददारी उस मुद्रा से नही कर सकते हैं । सरकार द्वारा पुरानी मुद्रा को बदलने की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती हैं एक निश्चित समय के लिए ।

क्या है विमुद्रीकरण?

विमुद्रीकरण (Demonetization) का सही तात्पर्य यह हैं कि जब किसी देश कि सरकार अपनी पुरानी मुद्रा को कानूनी रूप से बंद कर देती हैं तो इस प्रक्रिया को विमुद्रीकरण (Demonetization) कहते हैं। विमुद्रीकरण होने के बाद उस मुद्रा की कोई कीमत नही रह जाती हैं । ये मुद्रा बनाड़ हो जाने के बाद आप कोई खरीददारी उस मुद्रा से नही कर सकते हैं । सरकार द्वारा पुरानी मुद्रा को बदलने की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती हैं एक निश्चित समय के लिए ।

क्यों किया जाता है विमुद्रीकरण?

सरकार का ऐसे निर्णय लेने के कई कारण होते हैं जैसे की यदि सरकार को नई मुद्रा बाजार में लाना हैं, कालाधन को समाप्त करना हैं। कालेधन का उपयोग आतंकवाद , अपराध और तस्करी जैसे आपराधिक कार्यो में भी बड़े पैमाने पर नगद लेन-देन होता है। इस तरह के कामो में लिप्त लोग नगद राशि अपने पास जमा करके रखते हैं बाज़ार में कई बार नकली नोट प्रचलन में आ जाते हैं सरकार इन नोटों से पार पाने के लिए भी ऐसे निर्णय लेती हैं । टैक्स चोरी के लिए किए जाने वाले नगद लेन-देन को हतोत्साहित करने के लिए भी सरकारें कई बार विमुद्रीकरण (Demonetization) का रास्ता अपनाती हैं।

भारत में कब-कब हुआ है ऐसा विमुद्रीकरण?

पहली बार विमुद्रीकरण साल में १९४६ में ५००, १००० और १०००० के नोटों का विमुद्रीकरण किया गया था । १९३८ से गठित भारतीय रिज़र्व बैंक ने अभी तक १० हजार रूपये से ज्यादा का नोट जारी नही किया हैं १९७० में प्रत्यक्ष कर की जांच से जुड़ी वानचू कमेटी ने कालाधन बाहर लाने और उसे खत्म करने के लिए विमुद्रीकरण (Demonetization) का सुझाव दिया था। लेकिन इस सुझाव के सार्वजनिक हो जाने की वजह से कालाधन रखने वालों ने तत्काल अपने पैसे इधर-उधर निकाल दिए।

१९७७ में इमरजेंसी हटने के बाद चुनाव हुए और केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। जनवरी, 1978 में मोरारजी सरकार ने एक कानून बनाकर 1000, 5000 और 10,000 के नोट बंद कर दिए। आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर आईजी पटेल सरकार के इस कदम से सहमत नहीं थे। पटेल के अनुसार ये फैसला कालाधन खत्म करने के बजाय पिछली भ्रष्ट सरकारों को खत्म करने के लिए बनाया गया था

आज तक भारत में किसी नोट को पूरी तरह बंद दो बार ही किया गया है लेकिन कई बार सरकरे पुराने नोट को धीरे-धीरे बंद कर देती है और उसकी जगह उतने ही कीमत के नए नोट जारी कर देती है। जैसे साल 2005 में मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार ने 500 के 2005 से पहले के सभी नोटों का विमुद्रीकरण (Demonetization) कर दिया था। 2005 से पहले छापे गए सभी 500 के नोटों के पीछे जारी किए जाने का साल नही लिखा होता था। सरकार ने बाजार में चल रहे 500 के नकली नोटों और नोटों की जमाखोरी को खत्म करने के लिए पुराने नोट बंद कर दिए थे । 500 के पुराने नोटों को बैंकों से नए नोटों से बदलने की सुविधा दी गई थी।

८ नवम्बर २०१६ को प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने ५०० व १००० के नोटों को अचानक बंद करने की घोषणा कर दी । हालाँकि इस तरह का कदम उठाने के लिए उन्हें तत्कालीन आर बी आई गवर्नर का समर्थन प्राप्त था । श्री उर्जित पटेल जी ने प्रधानमंत्री जी के इस कदम को बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय बताया । हालांकि आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन विमुद्रीकरण (Demonetization) को कालाधन बाहर लाने के लिए ज्यादा कारगर नहीं मानते हैं। कई अन्य विशेषग्यो ने इस कदम पर सवाल उठाये हैं सलाहकारो का कहना हैं कि ब्लैक मनी रखने वालो में ज्यादातर लोग अपने पैसे विदेशी बैंको में रखते हैं। इसलिए इस विमुद्रीकरण से बड़े लोगो का कुछ नही होगा जिनके पास बहुत ज्यादा मात्रा में कला धन हैं ।

नोटबंदी से पहले 500 और 1000 के कितने नोट थे बाजार में?

आरबीआई के अनुसार 31 मार्च 2016 तक भारत में 16.42 लाख करोड़ रूपये मूल्य के नोट बाजार में थे जिसमें से करीब 14.18 लाख रुपये 500 और 1000 के नोटों के रूप में थे। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार कुल देश में तब तक मौजूद कुल 9026 करोड़ रूपये के नोटों में से करीब 24 प्रतिशत नोट (करीब 2203 करोड़ रुपये) ही प्रचलन में थे बाकी के नोट काउंटिंग में नही थे या तो कही छुपे हुए थे या रखे हुए थे जो की देश की तराक्की के लिए अच्छा नही था ।

विमुद्रीकरण (Demonetization) होने से फायदा या नुक्सान?

बड़े नोटों को बंद करने का फ़ैसला भ्रष्टाचार पर चोट करने के इरादे से लिया गया है. इसके साथ ही तत्कालीन सरकार को लगता है कि इस फ़ैसले से अरबों रूपये की बेहिसाब रकम को अर्थव्यवस्था से खींचा जा सकता है. भारत के कुल मुद्रा प्रसार में इन दो नोटों की मौज़ूदगी 80 प्रतिशत से ज़्यादा है.

विश्व बैंक के पूर्व चीफ़ इकनॉमिस्ट कौशिक बासु का कहना है, ”भारत में गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) अर्थव्यवस्था के लिए ठीक था लेकिन विमुद्रीकरण (नोटों का रद्द किया जाना) ठीक नहीं है. भारत की अर्थव्यवस्था काफ़ी जटिल है और मुख्यतः इंडिया में बिज़नस कैश मुद्रा में होता हैं और इससे फायदे के मुक़ाबले व्यापक नुक़सान उठाना पड़ेगा. कई जगह पर कंपनियां बन्द पड़ी हुई हैं क्योंकि उनके पास रोजदारी मजदूरो को देने के लिए कैश पैसा नही है।

अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि सरकार के इस कदम से साफ है कि उन्हें पूंजीवाद की समझ नहीं है.

ज़ाहिर है इस पर भी लोगों की राय बंटी हुई दिखाई दे रही हैं कि नोटों को रद्द करना सही है या गलत.

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